
गोविंद अग्रवाल/कोलकत्ता। रणथंभौर के सबसे पुराने गणेश मंदिर की चौखट तक आने में आम गणेश भक्त आज भी दसवीं सदी की ही तकलीफें झेल पुराने रीति-रिवाज निभाने में अघाते नहीं दिखते हैं। क्योंकि गजानन भी इससे अनजान नहीं कि अपने इष्ट का दरस पाने में भक्त अपने धीरज की कोई भी परीक्षा देने को तैयार रहता है। श्रद्धा और समर्पण में डूबे इन श्रद्धालुओं का सरोकार अपने गणपति बप्पा के मंदिर का दर्जा ‘वर्ल्ड हेरिटेड’ में शुमार होकर बढ़ जाने से रत्तीभर नहीं है। सच कहें, तो ‘विश्व धरोहर’ बने इस मंदिर में पहुंचते थके-मांदे दर्शनार्थियों का गला सूख आने पर भी पानी का बूँद तक नहीं मिलने, महिलाओं तक को शौच के लिए इधर-उधर किसी आड़ की तलाश करने और बिजली का नामोनिशान न होने सरीखे बदतर हालात में कोई तब्दीली नहीं आने की जवाबदेही किसकी बनती है! चमत्कारी मंदिर की आस्था संजोये भक्तों की ओर से सालाना चढ़ता बेहिसाब चढ़ावा किसकी झोली में जाता है? इस भारी रकम से ही बेहद आसानी से श्रद्धालुओं की बुनियादी सहूलियतों का इंतजाम हो सकता है। यूनेस्को से मिली इस मंदिर को ‘विश्व धरोहर’ की मर्यादा गणेश भक्तों के किस काम आयेगी? वहीं यह प्रासंगिक सवाल भी उठ खड़ा होता है कि वर्ल्ड हेरिटेज और भारतीय पुरातत्व विभाग के अधिकार क्षेत्र में मंदिर का संरक्षण आने के बावजूद यात्री सुविधाओं को किस बिना पर अनदेखा किया जा रहा है? जबकि रणथंभौर किले के 700 किमी परिसर में ही सुप्रसिद्ध अभयारण्य पर्यटकों की तमाम सुविधाओं से लैस है। इस दोहरे मानदण्ड का सटीक उत्तर मंदिर देखभाल के विशेषज्ञों के पास भी शायद नहीं होगा! इस किले को घुमा कर दिखानेवाले गाइड भी इस सवाल पर चुप्पी साधे होते हैं।
जरा अंदाजा लगाइये, राजस्थान के सवाईमाधोपुर जिले के रणथंभौर में अरावली-विंध्याचल की 1579 फीट पहाड़ी ऊँचाई पर इस विश्वप्रसिद्ध स्वयंसृष्ट त्रिनेत्र गणेश मंदिर, जिसे रणतभँवर मंदिर भी कहा जाता है, की ड्यौढ़ी तक खस्ताहाल रास्ते से गुजरते हुए पहुंचने में यात्रियों को कितनी मेहनत-मशक्कत करनी पड़ती है! यह भक्ति की शक्ति ही है कि दर्शनार्थी सारी बाधाओं से अपने भक्तों को दूर रखनेवाले गणेशजी का दर्शन पाकर ही राहत की साँस ले पाते हैं। रही बात बड़े-बूढ़ों की, तो उन्हें खटोले पर लाद कहारों के मजबूत कंधे मंदिर की दहलीज पर पहुंचाने-उतारने में मददगार साबित होते हैं। हाल ही में इस गणेश मंदिर की यात्रा के दौरान परेशानजदा यात्रियों की जद्दोजहद का जायजा लेते हुए इस सुख्यात भ्रमण-वृत्तांत लेखक ने अपनी आपबीती को सामने लाना बेहद जरूरी समझा। 1000 साल पहले मंदिर बनने से अब तक गणपति दर्शनार्थियों की मुश्किलें जस की तस बनी हुई हैं। इसीलिए इस मुद्दे पर 21वीं सदी में आकर गुहार मचाना वक्त का तकाजा बन गया है। क्योंकि अब नहीं, तो कभी नहीं। लगता है, अकारण दुख झेलना भक्तों की नियति बना दी गयी है।
राष्ट्रीय धरोहर कहे जानेवाले इस मंदिर की क्या है महिमा! यह विश्व का पहला गणेश मंदिर है, जिसमें मूर्ति बनी-बनायी नहीं, स्वयं प्रकट हुई। 1299-1301 ई. में महाराजा हमीरदेव चौहान और बादशाह अलाउद्दीन खिलजी के घमासान के बीच जब लगभग 9 महीने से भी अधिक समय तक रणथंभौर किला शत्रुओं के कब्जे में आ गया था, बिल्कुल ऐन वक्त महाराजा चौहान को उस स्थान पर गणेश जी ने पूजन का स्वप्नादेश दिया, जहाँ आज स्वयं गजानन विराजित हैं। यहीं उन्हें गणपति प्रतिमा प्राप्त हुई थी। 10वीं सदी में महाराजा चौहान ने वहीं यह मंदिर बनवाया था। विश्वभर में केवल 4 स्वयंभूं गणपति मंदिरों में से प्रथम रणथंभौर, द्वितीय गुजरात, तृतीय उज्जैन और चतुर्थ मध्यप्रदेश में अवस्थित है।
सतयुग में श्रीराम ने लंका जाने से पूर्व इसी त्रिनेत्र लंबोदर की पूजा की थी। द्वापर युग की किंवदंती है मुरलीधर अपने पाणिग्रहण समारोह में विनायक को आनंत्रण देने से चूक गये, तो रणथंभौर आकर ही मनुहार करना पड़ा था।
रणथंभौर के त्रिनेत्र गणेश मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता प्रतिदिन हजारों की संख्या में आनेवाले पत्रों का तांता लगा रहता है। दूसरे, दुनियाभर के गणपति भक्त अपने घरों के किसी भी पावन कार्य, यथा विवाह, व्यवसाय, अन्नप्राशन का प्रथम आमंत्रण पत्र गणाधिपति को ही भिजवाते हैं। संकटग्रस्त व्यक्ति यहीं पत्र भेज परित्राण की विनती भी करता है। बादस्तूर यह सिलसिला दसवीं सदी से ही चला आ रहा है। सुनते हैं, यहाँ मनौती की किसी भी अरज को गजानन अनसुनी नहीं करते हैं।
चौहान राजाओं के शासनकाल से ही हर साल लाखों की तादाद में विग्नेशभक्तों की उपस्थिति में मेला लगा कर भाद्रपद शुक्ल के गणेश चतुर्थी की रीति चली आ रही है। उल्लेखनीय है, रणथंभौर के दुर्लभ त्रिनेत्र गणेश का केवल मुखमंडल ही दिखाई देता है। कहना न होगा कि रणथंभौर किले पर मुगल बादशाहों के हमलों के बीच अक्षत यह मंदिर चमत्कार से कम नहीं है। इसीलिए माथा टेकते श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है।
ताज्जुब की बात, युनेस्कों से वर्ल्ड हेरिटेज करार दिये जाने और भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में होने के बावजूद इस अभूतपूर्व मंदिर तक सुगमतापूर्वक पहुंचने और मंदिर के अहाते में यात्रियों के लिए अनिवार्य न्यूनतम सुविधाओं को सिरे से ही नजरअंदाज कर दिया गया। इसके पीछे मजबूरी के जो भी बहाने बनाये जायें या बचाव में सफाई की आड़ ली जाये, सच्चाई यही कहती है कि सदियों से श्रद्धालु मौन धारण कर अपने देवता के नाम सब्र का इंतहान देते आ रहे हैं। इसीलिए यह मुद्दा कभी भी सरकार या प्रशासन के लिए सरदर्द का कारण नहीं बन पाया। लेकिन अब समय आ गया है यात्रियों के हित में आम जनता में जागरुकता फैलाई जाये। मुमकिन है, बतौर असर इस मामले से जुड़े लोगों के कान खड़े हो जाएं। इस मसले पर राजस्थानी समाज पर उँगली उठना भी कतई बेमानी नहीं।

































