शीर्षक: “सिसकते ख़्वाब: इंसाफ़ के सूखे साये में दम तोड़ती बेटियाँ”- ✍️ गौरव वर्मा

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गौरव वर्मा की कलम से…
“दास्तान भी पुरानी हैं, किरदार भी पुराने हैं बदलाव भी हुए पर सिर्फ़ सरकारी फाइलों में, और बहुत हद तक इन बदलाओं का असर सिर्फ फाइलों तक ही रह जाता है,
हर बार हम इसी उम्मीद में होते हैं कि शायद अब हालात बदलेंगे, पर जो बदलता है वो सिर्फ हमारे ख्वाब हैं। इंसानियत के खिलाफ हुए इन जुर्मों का सिलसिला थमता नहीं, और हम सब के सब, बस तमाशबीन बने रहते हैं।”

रोज़ देश के किसी न किसी कोने में बेटियों की चीखें उन दीवारों से टकराती हैं, जिनके कान बहरे हो चुके है|
जिस समाज में माँ-बहन की इज़्ज़त की बातें बड़ी शिद्दत से की जाती हैं, वहीं उन्हीं बेटियों की अस्मिता को दरिंदगी से कुचला जाता है। पर हम क्या करें? हम तो बस वही देखते हैं, जो दिखाया जाता है।”

“सियासतदान तो अपना काम कर रहे हैं। बयान देना, मुआवज़ा घोषित करना, और फिर अगली घटना का इंतजार करना। अदालतें तारीख़ पर तारीख़ देती रहेंगी, और हम सोचते रहेंगे कि कभी तो इंसाफ़ मिलेगा।
‘इंसाफ़ का सूरज फिर से निकलेगा,’ये ख्याल मन में लिए हम सो जाते हैं। और जब जागते हैं, तो वो भी सिर्फ़ इसलिए कि कोई और हादसा हमें जगा देता है।

आज इंसानियत की सदा, बेजुबान हो चुकी,
हर गली में ख़ामोशी का आलम है।

कितने ही वादे किए जाते पर हालात जस के तस हैं। ये हमारे सिर्फ़ हमारे सिस्टम की विफलता नहीं, बल्कि हमारे इंसानियत की सबसे बड़ी हार है।”
ससमय ऐसा है की बेटियों की रूहें कफ़न में भी सिसकती हैं, हमारी मोमबत्तियां कब तक इंसाफ की रोशनी का रूप लेकर उन्हें सुकून दे पाएंगी? इन मोमबत्तियों का छलावा, कब तक छलेगा उन आत्माओं को, इसका जवाब शायद ही हमारे पास हो,।।
जब कानून सिर्फ काग़ज़ पर हो, और इंसाफ़ सिर्फ किताबों में, तो अपराधी बेख़ौफ़ हो जाते हैं

“हर बार हम यही कहते हैं, ‘अब और नहीं।’ पर हर बार हम वही देखते हैं, जो हम नहीं देखना चाहते। अब वक़्त आ गया है कि हम सिर्फ़ कहने और सुनने से आगे बढ़ें। बदलाव के लिए लड़ना होगा, उठ खड़े होना होगा, क्योंकि ‘अब और नहीं’ सिर्फ़ एक जुमला नहीं, बल्कि एक मंशा होनी चाहिए।”

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