हरियाणा कला परिषद् मल्टी आर्ट कल्चरल सेंटर द्वारा तीन दिवसीय सांग उत्सव का आयोजन

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प्रवीण कौशिक/करनाल :  हरियाणा स्वर्ण जयंती वर्ष के दौरान हरियाणा कला परिषद् द्वारा प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के द्वारा कला का धारा प्रवाह किया जा रहा है। ऐसी ही एक झलक करनाल के गांव मोहड़ी जागीर में देखने को मिल रही है, जहां हरियाणा कला परिषद् मल्टी आर्ट कल्चरल सेंटर द्वारा तीन दिवसीय सांग उत्सव का आयोजन किया जा रहा है।

11 जून से शुरु हुए सांग उत्सव के पहले दिन सतपाल कश्यप द्वारा सांग खाण्डेराव परी का मंचन किया गया। इस मौके पर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक प्रो. देवेंद्र राज अंकुर बतौर मुख्यअतिथि उपस्थित रहे वहीं हरियाणा कला परिषद् के उपाध्यक्ष सुदेश शर्मा द्वारा कार्यक्रम की अध्यक्षता की गई। सांग उत्सव के पहले दिन वीर विक्रमाजीत-खाण्डेराव परी का मंचन किया गया वहीं दूसरे दिन सांग नौरत्न विष्णु पहलवान के निर्देशन में मंचित किया गया। सांग उत्सव के समापन पर पं राजेश वत्स थूरानियां द्वारा सांग धु्रव भगत का मंचन किया जाएगा। सांग उत्सव में दिखाए गए सांग खाण्डेराव परी में कलाकारों ने सांग कला के माध्यम से हरियाणवी लोक संस्कृति की झलक पेश की। सांग का मंचन करते हुए दिखाया कि मानसरोवर झील में हंसों का बसेरा था।

इंद्र देवता ने उन्हें 12 वर्ष का देश निकाला दे दिया। हंस उज्जैन के राजा वीर विक्रमाजीत की शरण में पहुंच गए। 11 वर्ष 11 महीने काटने के बाद हंस वापिस वतन लौट रहे थे तो इंद्र देवता ने उनकी एक हंसनी कैद कर ली। निराश होकर हंस फिर राजा वीर विक्रमाजीत के पास फरियाद लेकर पहुंचे। राजा हंसों की मदद के लिए चल पड़ता है। रास्ते में जब वह एक सराय में विश्राम करता है तो सराय की संचालक को रोते देख उसकी दास्तां सुनता है। राजा को पता चलता है कि इस क्षेत्र के राजा शामधाम की पुत्री रत्न कौर हर रोज एक व्यक्ति को मौत का ग्रास बनाती है। सराय संचालक के पुत्र की बारी है। वीर विक्रमाजीत खुद रत्न कौर के पास जाता है। रात को रत्न कौर के मुख से सर्प निकलकर जब राजा की ओर लपकता है तो राजा तलवार से उसके टुकड़े.टुकड़े कर देता है।

राजा शामधाम वीर विक्रमाजीत के साथ अपनी पुत्री की शादी कर आधा राज्य दे देता है। इसी दौरान वीर विक्रमाजीत की मुलाकात इंद्र के अखाड़े से पृथ्वी लोक पर घूमने आई खांडेराव परी से होती है। विक्रमाजीत खांडेराव परी के साथ इंद्र के अखाड़े में पहुंचते हैं। जहां तबला वादक की तबियत खराब होने पर वह खुद तबला बजाकर अपने दादा इंद्र देव को खुश करते हैं। खुश होकर इंद्र उन्हें वरदान मांगने को कहते हैं। विक्रमाजीत हंसनी को लेकर वापिस हंसों को सौंपकर अपना दायित्व निभाता है। सांग मंचन के दौरान सभी दर्शकों ने तालियों के माध्यम से कलाकारों की हौंसलाअफजाई की। इस मौके पर हरियाणा कला परिषद् से रविंद्र कुमार, ग्राम सरपंच रामनिवास, कवंर भान, रामनिवास शर्मा, मदन लाल, पंडित रामशरण सांगी, विष्णु पहलवान तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति विशेष रुप से उपस्थित रहे।

 

साभार : वेबवार्ता

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