गुरु और शिष्य के बिच भारतीय संस्कृति और परम्परा का प्रतिक है गुरु पूर्णिमा -सतपाल जी महाराज

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संवाददाता/मुरादनगर| मानव उत्थान सेवा समिति द्वारा आयोजित गंगनहर स्थित श्री हंस इंटरमीडिएट कॉलेज के प्रांगण में गुरु पूजा महोत्सव पर उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री व समाज सेवी श्री सतपाल जी महाराज ने अपने संबोधन में कहा कि गुरु और शिष्य के बिच भारतीय संस्कृति और परम्परा का प्रतिक है गुरु पूर्णिमा| अध्यात्म ज्ञान में अद्भुत शक्ति है, जिससे सभी विघ्न दूर होते है तथा समाज में फैली विकृतियां समाप्त हो जाती है| इसलिए ज्ञान व कर्म का समन्वय होने से हम राष्ट्रवादी बनेंगे और अपने देश को मजबूत करेंगे|

उन्होंने कहा की भक्ति-साधना करते समय माया के बड़े ही खिंचाव, आकर्षण आया करते हैं| जब कोई ऋषि साधना करने बैठते थे तो सबसे पहले इंद्र को भय लगता था यदि इसकी साधना पूरी हो गयी तो यह मेरा इंद्रासन(सिंहासन)  छीन लेगा| वह साधक के सामने नाना प्रकार की अप्सराओं को, नर्तकियों को  भेजते थे जिससे एक भक्त की भक्ति या साधना पूरी ना हो, माया का ऐसा आकर्षण होता है| इस सन्दर्भ में भगवान श्रीकृष्ण महाराज गीता के कर्मयोग शास्त्र में सार शब्द की बात रखते हुए कहते हैं कि पार्थ! माया के भोगों से विरक्त होना ही वैराग्य कहलाता है जब जीवन में वैराग्य होगा तो साधना में मन लगेगा, इसलिए उन्होंने भजन अभ्यास की चर्चा की |

श्री महाराज जी ने आगे कहा कि मन बार-बार संसार के भौतिक पदार्थो की ओर ही जाना चाहता है, इसे रोकने का केवल एक ही उपाय है कि सद्गुरु की शरण में जाकर ज्ञान प्राप्त करके भजन-साधना करें| इससे ही मन की चंचलता शांत होगी और यह ज्ञान सद्गुरु की शरण में जाए बिना प्राप्त नहीं होता है |

समारोह में श्री महाराज जी, पूज्य माता अमृता जी, श्री विभु जी व श्री सुयश जी महाराज का फूल-मालाओं से स्वागत किया गया| कार्यक्रम में देश के अनेक राज्यों से पधारे संत-महात्माओं ने भी अपने विचार व्यक्त किये| मंच संचालन महात्मा हरिसंतोषानन्द जी ने किया|

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