कोरोना से हुए बेरोज़गारों का स्वरोज़गार शुरू करा रही संस्था दीपालय

प्रोजेक्ट की वजह से सभी परिवारों की आय लगातार बढ़ रही है। पलायन पर रोक लगी है और बच्चों की पढ़ाई भी जारी है। महिलाओं का सशक्तिकरण हुआ है और परिवारों में उनका सम्मान बढ़ा है। स्वयं सहायता समूह में जुड़ कर बचत करने और एक दूसरे की आर्थिक मदद करने की क्षमता का विकास हुआ है। स्व-रोजगार की वजह से परिवार आत्मनिर्भर हुए हैं।

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संवाददाता/ नई दिल्ली। कोरोना की दूसरी लहर और देशभर में लॉकडाउन की वजह से राजधानी दिल्ली के ओखला में बसे संजय कॉलोनी और आसपास के स्लम बस्तियों में हजारों गरीब मजदूरों की नौकरियां चली गई। काम धंधे ठप पड़ गए। अनेकों गरीब परिवार वापिस अपने गांव चले गए। जो परिवार बच गए उनके लिए रोजगार सबसे बड़ी समस्या बनकर खड़ी हो गई। जीवन चलाना मुश्किल हो गया। झुग्गी-बस्तियों में काम कर रहे हैं कई स्वयंसेवी संस्थाओं ने मोर्चा संभालते हुए हर संभव मदद पहुंचाने का काम किया।

देश के कई राज्यों में गरीबों के बीच काम करने वाली संस्था दीपालय ने कोरोना महामारी और लॉकडाउन की मार झेल रहे हजारों परिवारों तक राशन और आर्थिक मदद पहुंचाया। किंतु लोगों के बीच काम करते हुए, संस्था ने यह महसूस किया कि लोगों की सबसे बड़ी समस्या रोजगार है, जिसकी कमी की वजह से परिवारों का पलायन हो रहा है और बच्चों की पढ़ाई छूट रही है।

रोजगार की समस्या का समाधान निकालने के लिए दीपालय और अबेरकॉम्बी एंड केन्ट फिलैंथ्रोपी (ए के पी) नामक संस्था के आपसी सहयोग से एक प्रोजेक्ट का जन्म हुआ, जिसका नाम था मिशन सलामती-रिबिल्डिंग फेज आफ्टर द लॉकडाउन।

प्रोजेक्ट का मकसद दिल्ली के झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले जरूरतमंद परिवारों को प्रशिक्षण, आर्थिक मदद और हर संभव सहयोग देकर उनका लघु उद्योग शुरू कराया जाना था। ताकि वह कंपनियों पर पूरी तरह से आश्रित ना होकर, अपना खुद का रोजगार शुरु कर सकें।


प्रोजेक्ट को साकार करने के लिए संस्था ने जरूरतमंद परिवारों का चयन किया। उनको जानकारी और हिम्मत देने के लिए उनकी काऊंसलिंग की गई। जरूरत के हिसाब से उनको प्रशिक्षण दिलाया गया। सबको आर्थिक मदद देकर, स्वरोज़गार शुरू कराया गया। जिसमें सिलाई की दुकान, परचून की दुकान, सब्जी की दुकान इत्यादि शामिल है।

आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए उनका एक स्वयं सहायता समूह (एस एच जी) बनाया गया जिसमें सभी सदस्य हर महीने कुछ बचत करते हैं। अपने काम की उपलब्धियां सांझा करते हैं। समस्यओं पर चर्चा करके सामूहिक रूप से समाधान ढूंढते हैं। अपनी बचत से जरूरत के अनुसार, आर्थिक रूप से एक दूसरे की मदद करते हैं।

संस्था की तरफ से समय समय पर, स्वरोज़गार को बढ़ावा देने के लिए चलाई जा रही विभिन्न सरकारी योजनाओं, आर्थिक लोन आदि की जानकारी दी जाती है। नियमित अंतराल पर सभी के स्थानों का दौरा किया जाता है। निगरानी रखी जाती है और जरूरत पड़ने पर रोज़गार के विकास के लिए, हर संभव मदद की जाती है।

प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी सफलता यह है कि कोरोना की दूसरी लहर ने एक तरफ जहां एकबार फिर लोगों के रोजगार और आर्थिक हालात पर बुरा प्रभाव डाला। वहीं दूसरी तरफ इन परिवारों का रोजगार और कमाई लगातार जारी रहा है।


सिलाई का काम शुरू करने वाली, इंदिरा कैंप की आज़रा खातून ने बताया कि ” दीपालय और ए के पी संस्था के सहयोग से मैंने सिलाई और ओवरलॉक मशीन खरीदा और घर से काम करते हुए, लॉकडाउन में 30000/- रुपये का काम किया। इससे कोरोना काल में मुझे परिवार चलाने में कोई दिक्कत नही आयी।”


ओखला के जे जे आर कैंप में रहने वाली, तीन बेटियों की माँ पिंकी देवी ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि ” मेरे परिवार में कोई कमाने वाला नहीं था। पति पैरालाइज हैं। दीपालय की मदद से मैंने घर पर ही परच्युन की दुकान खोली। लॉकडाउन में काम बहुत अच्छा हुआ और मेरे घर का खर्च चल रहा है।”


भूमिहीन कैम्प के जयप्रकाश ने चप्पल की दुकान के साथ साथ अब सब्जी की दुकान भी चलाना शुरू किया है। उनका बिजनस अब पारिवारिक बिजनेस में तब्दील हो गया है। पत्नी और अन्य सदस्य भी सहयोग कर रहे हैं। परिवार की आय बढ़ी है।

प्रोजेक्ट को-ऑर्डिनेटर प्रदीप कुमार ने बताया कि इस प्रोजेक्ट की वजह से सभी परिवारों की आय लगातार बढ़ रही है। पलायन पर रोक लगी है और बच्चों की पढ़ाई भी जारी है। महिलाओं का सशक्तिकरण हुआ है और परिवारों में उनका सम्मान बढ़ा है। स्वयं सहायता समूह में जुड़ कर बचत करने और एक दूसरे की आर्थिक मदद करने की क्षमता का विकास हुआ है। स्व-रोजगार की वजह से परिवार आत्मनिर्भर हुए हैं।

दीपालय की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर मिस जसवंत कौर ने कहा कि अगर हमें फंडिंग मिले तो हम इस प्रोजेक्ट पर और बड़े स्तर पर काम कर सकते हैं और ज्यादा से ज्यादा जरूरतमंदों को इसका फायदा हो सकता है। उन्होंने आर्थिक सहयोग के लिए आग्रह किया।

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