बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ…

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लेखक के कलम से…

पढ़ने दो हमें पिताजी , हम तो अभी छोटे बच्चे हैं !
खेलने दो हमे सहेलियों के संग , हम मन के अभी कच्चे हैं !!
मत करो बाल विवाह , यह मेरे साथ अन्याय है !
देख लो उनके ससुराल में जाकर जो बेटी असहाय है !!

हमें अभी अपने परिवार में, माँ के आँचल की छाँव में रहना है !
पढ़ लिख कर सफलता के बुलन्दियों पर हमें चढ़नाहै !!
मत तोड़ो हमें अभी , हम कली हैं कोई खिले फूल नहीं !
मत फेंको पिताजी मुझे अपने घर से , हम आपके पग की शूल नहीं !!

अभी तो हमारा दूध का दाँत भी टूटा नहीं !
माँ के हाथों खाने का आदत भी छूटा नहीं !!
नहीं निभा पायेंगे हम ससुराल के रीति रिवाजों को !
कोमल हाथों से कैसे कर पायेंगे घर के काम-काजो को !!

जो सिर्फ बेटा करे ऐसा क्या है जो बेटी नहीं कर सकती है !
देश की रक्षा के लिए बेटी भी सरहद पर लड़ सकती है !!
बुढ़ापे में बेटी भी माँ-बाप का सहारा बनती है !
पढ़ लिख कर बेटी भी देश का सितारा बनती है !!

बेटी को बोझ मत समझो ,बेटी अपने परिवार का बोझ उठा सकती है !
अपने परिवार की खातिर बेटी भी जान लूटा सकती है !!
बेटे के तरह बेटी को भी पढ़ने का अधिकार है !
नारी-शिक्षा के बगैर सभ्य समाज की कल्पना ही बेकार है !

हम अभी ठीक से चलना सीखे नहीं , हमें मत छोड़ो बीच सड़क में !
बचपन में शादी करके बेटियों को , मत धकेलो नरक में !!
मत करो बाल विवाह बेटियों का, यह एक पाप है !
बाल-विवाह समाज का एक अभिशाप है !!

लेखक : श्याम रतन साहू

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