डीजे की गूंज में अश्लील गाने और रंगारंग कार्यक्रम से माँ सरस्वती की पूजा-आराधना।

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डी.डी.चौहान, कुशीनगर,उ.प्र.। जिस शक्ति की आज आराधना और पूजा किया जा रहा है, जिस शक्ति के कृपा के बिना मनुष्य बिना सींग और पूंछ का एक पशु है। जिस देवी माँ की आज पूरा संसार पूजा आराधना कर रहा है, उसी की कृपा से मानव पूज्यनीय वंदनीय होता है, मानव से महामानव बनता है और उसकी सर्वत्र पूजा होती। आज उसी ज्ञानदायिनी,वीणावादिनी माँ सरस्वती की पूजा पद्धति में पूरा बदलाव आ गया है। वसंत पंचमी के अवसर पर आज सरस्वती पूजन करके समाज बहुत क्रेडिट लेना चाहता है। खास तरह से युवा समाज अपने मार्ग से बिल्कुल भटक चुका है। वह कहा जा रहा है और क्या कर रहा है यह तो समझना अपने आप में एक बहुत बड़ा चुनौती का विषय बना हुआ है।
वसंत पंचमी के दिन पूरी-पूरी रात शराब पीकर माँ की पूजा करते है, अश्लील गाने बजाकर डांस करते है। और माँ सरस्वती के सबसे बड़े भक्त होने का दावा भी करते है। लानत है ऐसी पूजा,भक्ति और ड्रामा पर। मूर्ति विसर्जन के दिन आर्केस्ट्रा के साथ अश्लील गाने और रंगारंग कार्यक्रम के माध्यम से नृत्यांगनाओं के नंगे नाच से आज समाज में बहुत बदलाव आ गया है। और पूजा आराधना की पद्धति भी बदल चुकी है। पहले के समय में बड़े बुजुर्ग और माँ-बहनों की संख्या अधिक होती थी और पूजन कार्यक्रम में सभी सम्मिलित होकर माँ की आराधना करते थे रात-रात भर माता के भजन और भक्ति भाव से ओत-प्रोत भजनों द्वारा सभी लोग जगराता करते थे। लेकिन आज तो सभ्य समाज नही दिखता है बल्कि केवल असभ्य समाज एकत्रित होकर पश्चिमी सभ्यता और कुरीतियों को बढ़ावा दे रहा है।

विद्या ददाति विनयम, अर्थात जो ज्ञान जो विद्या विनय और नम्रता प्रदान करती है वही आज के शिक्षित समाज से अभिमान और अहंकार की बू आती है। सभी बुराई का खान बना हुआ है। जब रात-रात भर डीजे बजता है तब आसपास के लोग सो नही पाते है किसी तरह से रात बिताने को मजबूर हो जाते है। मूर्ति विसर्जन के समय रोड पर ऐसा माहौल होता है मानो किसी मैच में अलग-अलग देश के खिलाड़ी खेल के मैदान में उतर चुके है और अपनी जीत का विगुल बजाने को उतारू है। चारो तरफ से डीजे और नंगा नाच, बीच में युवा समाज नशे में डांस करते हुए ज्ञानदायिनी सरस्वती मां की आराधना समझ कर अपना हर्ष व्यक्त करता है।
“येसां न विद्या, न तपो, न दानं, ज्ञानेन शीलं न गुणों, न धर्मह।
                                                       ते मर्त्यलोके भुविभारभूताः, मनुष्य रूपेण मृगाश्चरन्ति।।”

अर्थात जिसके पास विद्या नही है, तप और दान देने की प्रवृत्ति नही है, जिसको ज्ञान नही है, न शील स्वभाव है, न अन्य गुण है और नाही जीवन मे धर्म है, वह मनुष्य इस पृथ्वी पर मृग पशु की भांति एक भार के समान है। आज समाज में यह बात साकार हो रही है। युवा समाज नशा और कुरीतियों का शिकार बन चुका है। वह क्या कर रहा है और कहाँ जा रहा है यह कुछ भी पता नही है। भटके हुए समाज को सही दिशा देने के लिए सभ्य और शिक्षित समाज को इसका मार्गदर्शन करना पड़ेगा।
इन कुरीतियों को दूर करने के लिए प्रशासन और सभ्य समाज को आगे बढ़कर ढोंग पाखंड पर रोक लगानी चाहिए। आर्केस्ट्रा और रंगारंग कार्यक्रमों पर रोक लगानी चाहिए। एक सभ्य समाज के निर्माण में सभी अपना-अपना योगदान दे।

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