नवरात्रि की महिमा और मान्यताएं

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साहुल पाण्डेय :  नवरात्रि एक हिंदू पर्व है। नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है नौ रातें। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति कि देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवां दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है। पौष, चैत्र, आषाढ, अश्विन प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों -महालक्ष्मी, महासरस्वती या सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। दुर्गा का मतलब जीवन के दुख को हटानेवाली होता है। नवरात्रि एक महत्वपूर्ण और प्रमुख त्योहार है जिसे पूरे भारत में महान उत्साह के साथ मनाया जाता है। नव का शाब्दिक अर्थ नौ है।

इसके अतिरिक्त इसे नव अर्थात नया भी कहा जा सकता है। चैत्र नवरात्रों में दिन बड़ेे होने लगते है, मौसम में परिवर्तन प्रारम्भ हो जाता है, प्रकृ्ति मे नया पन आ जाता है यू कहे की सर्दी के किकुड़ के बाद नई ताजगीका मौसम प्रारंभ हो जाता है।ऋतु के परिवर्तन का प्रभाव जनों को प्रभावित न करे, इसलिये प्राचीन काल से ही इस दिन से नौ दिनों के उपवास का विधान है चैत्र नवरात्रा हिन्दु नव बर्ष के आरंभ का त्योहार है। नौ देविया की होती है पुजा ‘शैलपुत्री – इसका अर्थ- पहाड़ों की पुत्री होता है।’ ‘ब्रह्मचारिणी – इसका अर्थ- ब्रह्मचारीणी।’ ‘चंद्रघंटा – इसका अर्थ- चांद की तरह चमकने वाली।’ ‘कूष्माण्डा – इसका अर्थ- पूरा जगत उनके पैर में है।’ ‘स्कंदमाता – इसका अर्थ- कार्तिक स्वामी की माता।’ ‘कात्यायनी – इसका अर्थ- कात्यायन आश्रम में जन्मि।’ ‘कालरात्रि – इसका अर्थ- काल का नाश करने वली।’ ‘महागौरी – इसका अर्थ- सफेद रंग वाली मां।’ ‘सिद्धिदात्री – इसका अर्थ- सर्व सिद्धि देने वाली।’ हमारी चेतना के अंदर तीन गुण सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण होते है। प्रकृति के साथ इसी चेतना के उत्सव को नवरात्रि कहते है। इन 9 दिनों में पहले तीन दिन तमोगुणी प्रकृति की आराधना करते हैं, दूसरे तीन दिन रजोगुणी और आखरी तीन दिन सतोगुणी प्रकृति की आराधना का महत्व है। आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशः अलग-अलग पूजा की जाती है। मां दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियां देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं। नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। नवदुर्गा और दस महाविद्याओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दशमहाविद्या अनंत सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं।

देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं। महाराष्ट्र में चैत्र नवरात्रि की शुरुआत गुड़ी पड़वा से और आन्ध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में उगादी से होती है। चैत्र शुक्ल पक्ष के नवरात्रों के साथ ही हिंदु नवसंवत्सर शुरू हो जाता हैं। जो की हिन्दु कैलेण्डर का पहला दिवस होता है। अतः भक्त लोग साल के प्रथम दिन से अगले नौ दिनों तक माता की पूजा कर वर्ष का शुभारम्भ करते हैं। भगवान राम का जन्मदिवस चैत्र नवरात्रि के अन्तिम दिन पड़ता है और इस कारण से चैत्र नवरात्रि को राम नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है। इस अवधि में उपवासक संतुलित और सात्विक भोजन कर अपना ध्यान चिंतन और मनन में लगा से स्वयं को भीतर से शक्तिशाली बना सकता है। एसा करने से उसे उतम स्वास्थय सुख के साथ पुन्य प्राप्त होता है। इन नौ दिनों को शक्ति की आराधना का दिन भी कहा जाता है। वर्ष में दो बार नवरात्रों रखने का विधान है। चैत्र मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नौ दिन अर्थात नवमी तक, ओर इसी प्रकार ठीक हह मास बाद आश्चिन मास, शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से विजयादशमी से एक दिन पूर्व तक माता की साधना और सिद्धि प्रारम्भ होती है। सिद्धियों पंप्त करने के लिये नौ दिनो में माता के नौ रुपों की आराधनाः नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक ओर मानसिक शक्तियों में वृ्द्धि करने के लिये अनेक प्रकार के उपवास, संयम, नियम, भजन, पूजन योग साधना आदि करते है। सभी नवरात्रों में माता के सभी 51 पीठों पर भक्त विशेष रुप से माता एक दर्शनों के लिये एकत्रित होते है। जिनके लिये वहां जाना संभव नहीं होत है, उसे अपने निवास के निकट ही माता के मंदिर में दर्शन कर लेते है। नवरात्र शब्द से नव अहोरात्रों का बोध करता है। इस समय शक्ति के नव रुपों कि उपासना की जाती है। इस समय शक्ति के नव रुपों की उपासना की जाती है। रात्रि शब्द सिद्धि का प्रतीक है। उपासना और सिद्धियों के लिये दिन से अधिक रात्रिंयों को महत्व दिया जाता है। हिन्दू के अधिकतर पर्व रात्रियों में ही मनाये जाते है। रात्रि में मनाये जाने वाले पर्वों में दिपावली, होलिका दशहरा आदि आते है। शिवरात्रि और नवरात्रे भी इनमें से कुछ एक हे। रात्रि समय में जिन पर्वों को मनाया जाता है, उन पर्वों में सिद्धि प्राप्ति के कार्य विशेष रुप से किये जाते है। नवरात्रों के साथ रात्रि जोडने का भी यही अर्थ है, कि माता शक्ति के इन नौ दिनों की रात्रियों को मनन व चिन्तन के लिये प्रयोग करना चाहिए। रात्रि में आध्यात्मिक कार्य करने के पीछे कारण:- ऋषियों ने रात्रि को अधिक महत्व दिया है। वैज्ञानिक पक्ष से इस तथ्य को समझने का प्रयास करते है। रात्रिं में पूर्ण शान्ति होती है। पराविधाएं बली होती है। मन-ध्यान को एकाग्र करना सरल होता है। प्रकृ्ति के बहुत सारे अवरोध समाप्त हो जाते है। शान्त वातावरण में मंत्रों का जाप विशेष लाभ देता है। एसे में ध्यान भटकने की सम्भावनाएं कम ही रह जाती है। इस समय को आत्मशक्ति, मानसि शक्ति और यौगिन शक्तियों की प्राप्ति के लिये सरलता से उपयोग किया जा सकता है। वैज्ञानिक सिद्धान्त के अनुसार दिन कि किरणों में करने पर मनन में बाधाएं आने की संभावनाएं अधिक रहती है। ठिक उसी प्रकार जैसे दिन के समय में रेडियों की तरंगे बाधित रहती है। परन्तु सूर्यअस्त होने के बाद तरंगे स्वतः अनुकुल रहती है। मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज की कंपन से वातावरण के दुर-दूर के किटाणु अपने आप समाप्त हो जाते है। इस समय को कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि के लिये प्रयोग किया जा सकता है। नवरात्रों का धार्मिक महत्व:- चैत्र नवरात्रा तांन्त्रिकों व तंत्र-मंत्र में रुचि रखने वाले व्यक्तियों के लिये उपयुक्त रहता है।

गृ्हस्थ व्यक्ति भी इन दिनों में माता की पूजा आराधना कर अपनी आन्तरिक शक्तियों को जाग्रत करते है। इन दिनों में साधकों के साधन का फल व्यर्थ नहीं जाता है। मां अपने भक्तों को उनकी साधना के अनुसार फल देती है। इन दिनों में दान पुन्य का भी बहुत महत्व कहा गया है। नवरात्रे की प्रचलित कथाएं:- इस पर्व से जुड़ी कथा अनुसार देवी दुर्गा ने एक भैंस रूपी असुर अर्थात महिषासुर का वध किया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर के एकाग्र ध्यान से बाध्य होकर देवताओं ने उसे अजय होने का वरदान दे दिया। उसको वरदान देने के बाद देवताओं को चिंता हुई कि वह अब अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करेगा और प्रत्याशित प्रतिफल स्वरूप महिषासुर ने नरक का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया और उसके इस कृत्य को देख देवता विस्मय की स्थिति में आ गए। महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और स्वयं स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा। देवताओं को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्वी पर विचरण करना पड़ रहा है। तब महिषासुर के इस दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं ने देवी दुर्गा की रचना की। ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा के निर्माण में सारे देवताओं का एक समान बल लगाया गया था। महिषासुर का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने अपने अपने अस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे और कहा जाता है कि इन देवताओं के सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और बलवान हो गईं थी। इन नौ दिन देवी-महिषासुर संग्राम हुआ और अन्ततः महिषासुर-वध कर महिषासुर मर्दिनी कहलायीं।

क्षत्रियों का यह बहुत बड़ा पर्व है। इस दिन ब्राह्मण शास्त्र-पूजन तथा क्षत्रिय शस्त्र-पूजन आरंभ करते हैं। विजयादशमी या दशहरा एक राष्ट्रीय पर्व है। दुर्गा-विसर्जन, अपराजिता पूजन, विजय-प्रयाग, शमी पूजन तथा नवरात्र-पारण इस पर्व के महान कर्म हैं। इस दिन संध्या के समय नीलकंठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है। क्षत्रिय/राजपूत इस दिन प्रातः स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर संकल्प मंत्र लेते हैं। इसके पश्चात देवताओं, गुरुजन, अस्त्र-शस्त्र, अश्व आदि के यथाविधि पूजन की परंपरा है। नवरात्रि के दौरान कुछ भक्तों उपवास और प्रार्थना, स्वास्थ्य और समृद्धि के संरक्षण के लिए रखते हैं। भक्त इस व्रत के समय मांस, शराब, अनाज, गेहूं और प्याज नही खाते। नवरात्रि और मौसमी परिवर्तन के काल के दौरान अनाज आम तौर पर परहेज कर दिया जाते है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि अनाज नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता हैं। नवरात्रि आत्मनिरीक्षण और शुद्धि का अवधि है और पारंपरिक रूप से नए उद्यम शुरू करने के लिए एक शुभ और धार्मिक समय है।

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