कविता
प्रेषक: श्याम रतन साहू, सिलीगुड़ी।

होली है हमारे देश का एक पवित्र त्यौहार ।
यह जीवन में लाता है खुशियाँ अपार ।
लोग सारे गम मिटा कर एक दूसरे से गले मिलते हैं ।
सूखी प्रेम वाटिका में खुशी के चमन खिलते हैं ।
होली है अधर्म पर धर्म की जीत का त्यौहार ।
आपसी प्रेम सद्भाव एवं खुशियों के गीत का त्यौहार ।
होली के पीछे छिपा है भक्ति और ज्ञान का सन्देश ।
भक्त को बचाने प्रभु प्रकट हुए धर कर नरसिंह का भेष ।
राक्षस कूल में जन्म लेकर भी प्रह्लाद बन गया भक्त ।
पर आज मनुष्य होकर भी लोग बहा रहे निर्दोष जीवों का रक्त ।
प्रह्लाद पर नारद मुनि के सत्संग का पड़ा था प्रभाव ।
पर आज आत्मज्ञान के बिना नहीं बदल रहा मनुष्य का स्वभाव ।
प्रति वर्ष लोग करते है होलिका दहन, पर अपने अज्ञानता को जलाते नहीं ।
खुद पीते शराब पर अपनी आत्मा को नाम का प्याला पिलाते नहीं ।
भूल चुके लोग कि भक्त प्रह्लाद कभी शराब पिया नहीं ।
खुद कितने कष्ट झेले पर कभी किसी जीव को तकलीफ दिया नहीं ।
पर इसी होली के नाम पर लोग कितने पशु को निगल जाते हैं ।
शराब के नशे में अपने अमूल्य जीवन को गंवाते हैं ।
पर ये हमारा सनातन धर्म का संस्कार नहीं है भाई ।
होली तो हिंसा को प्रेम से जीतना दुनियाँ को है सिखाई ।
आओ सद्गुरु के सत्संग में उस अध्यात्म को जाने ।
सनातन धर्म के अपने आध्यात्मिक रीती-रिवाजों को मानें ।
सात्विक तरीके से होली पर्व को मिलजुल कर मनायें ।
अपने शुद्ध आचरण से देश में सद्भावना फैलायें ।































