लुप्त होती जा रही कृषि और गौपालन

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कविता

भारत देश वैसे तो एक कृषि प्रधान देश है !
पर अब यह तथ्य सिर्फ किताबों में ही शेष है !!
धीरे धीरे लुप्त हो रहे है गाँव के खेत-खलिहान !
विकास के नाम पर इनका स्थान ले रहा फैक्ट्री और मकान !!

जैसे नारी के कारण ही सुन्दर दिखती है घर और आँगन !
वैसे ही गाँव की मर्यादा और ख़ूबसूरती है खेती और गौपालन !!
अधिक धन कमाने के चक्कर में किसान शहरों में जाने लगे !
गाँव की हरियाली से अधिक उन्हें शहर की चकाचौंध भाने लगे !!

पहले गाँवों में लोग खुशहाल थे करके गौपालन और खेती !
दूध-दही और अन्न की कमी नहीं थी किसीकी !!
सब हृष्ट-पुष्ट थे प्रकृति के गोद में उपजे शुद्ध अन्न खाकर !
खुश रहते थे लोग एक साथ परिवार में , अपनों का प्रेम पाकर !!

समय बीतता गया , चारों तरफ विकास की नारा गूँजने लगे !
अब किसान भी खेत देखकर आँख अपना मूंदने लगे !!
इस विकास के कारण गाँव के खेतों ने अपनी हरियाली खोया है !
खेती वाली उपजाऊ भूमि में लोगों ने बालू और सीमेंट को बोया है !!

पहले सड़क के किनारे लहलहाते धान की फसलें मन को लुभाती थी !
खेतों में कहीं सरसों के फूल तो कहीं हरी सब्जी नजर आती थी !!
आज कोई नहीं करना चाहता धान और गेहूँ की खेती !
फिर कैसे आ पायेगा हम सबकी थाली में चावल और रोटी !!

किसान भी बेचारा क्या करे , कितने मेहनत और लागत से फसल उपजाते हैं !
पर अनाज बिक्री के समय वे सिर्फ लागत मूल्य ही पाते हैं !!
सिर्फ खेती से उनका गुजारा नहीं हो पा रहा !
इसलिए तो जीविका के लिए शहरों की तरफ जा रहा !!

– श्याम रतन साहू

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