बिहार को जातिवाद में उलझा कर रखना चाहते है आरजेडी के कुछ नेता 

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नन्द कुमार सिंह। देशभर में जातिगत जनगणना कराए जाने और आरक्षण को नौवीं अनुसूची में डालने की मांग को लेकर 1 सितम्बर को राष्ट्रीय जनता दल ने राज्यव्यापी धरना-प्रदर्शन करने का आह्वान किया है। इस बात की जानकारी आरजेडी के प्रदेश प्रवक्ता चित्तरंजन गगन ने दी।
देशभर में जातिगत जनगणना कराने एवं बिहार विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के सेवाकाल वाली बिहार की महागठबंधन सरकार के 17 महीने में बढ़ाई गई 65 प्रतिशत आरक्षण सीमा को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर एवं उक्त मांगों के प्रति केन्द्र की एनडीए सरकार के नकारात्मक रवैय्ये के खिलाफ राष्ट्रीय जनता दल ने आगामी 1 सितम्बर को राज्यव्यापी धरना-प्रदर्शन करने का फैसला लिया है।
कुछ नेतायों का, देश को विकास के रास्ते से भटकाने का प्रयास
आप सभी को बताते चले कि बिहार में विकास के बहुत सारे मुद्दे हैं जिसमे शिक्षा और बेरोजगारी सबसे अहम मुद्दा है। इसपर आरजेडी का कोई प्रतिक्रिया नहीं होकर आरक्षण और जातिगत जनगणना पर फोकस क्यो होता है?
     बिहार में पुरुष साक्षरता दर 71.20% है और महिला साक्षरता दर 51.50% है। यह राष्ट्रीय औसत से काफी कम है जो कुल मिलाकर 74.04% है। भारत में पुरुष साक्षरता दर 82.14% और महिला साक्षरता 65.46% है। यह 8 जुलाई 2024 तक के आंकड़े है। सर्वे रिपोर्ट की माने तो ये नही चाहते कि लोग शिक्षित होकर अच्छे लीगो से मुकाबला कर सके क्योंकी जिसदिन ऐसा हुया की लोग शिक्षित और स्वावलंबी हो गए उसदिन से इनकी जात की राजनीति समाप्त हो जायेगी  और पीछे चलने वालों का जनसंख्या न के बराबर हो जाएगा।
अशिक्षित और बेरोजगार युवाओं को ये जातिवाद का पाठ पढ़ाकर ये उन्हें उस कैटगरी में खड़ा नही होने देना चाहते जहाँ से यो हर कंपटीशन को फेज कर सके चुकी ऐसा होने से बिहार ही नही पूरे भारत मे अमन चैन की बहाली हो जाएगी  फिर ये राजनीत किसे लेकर करेंगे।
    जब बिहार या पूरे भारत मे शिक्षा का संचार करना हो या गरीबी दूर करना हो तो इसकी एक ही मापदंड होना चाहिए। देश की जनता को तीन कैटेगरी में बांटा जाय -(1)अमीर (2)मध्यम और (3) गरीब। सबसे पहले गरीब को मुफ्त पूर्ण शिक्षा जब तक यो रोजगार में न आ जाय और जैसे ही वह रोजगार में आये ग़रीबी रेखा से बाहर कर दिया जाय इस तरह मध्यम वर्ग को भी मुहैया कराया जाय परन्तु एक सीमा के अंतर्गत। नही इसमें जातिवाद का नाम आएगा नही किसी धर्म का नाम आएगा। प्रति वर्ष कितने गरीबी रेखा से बाहर आये इसके आँकड़े भी सरकार के पास मिलते रहेंगे।
  अभी यहाँ के ओक्षी राजनीतिक करने वाले नेतायों और सरकार से यह सवाल किया जाय 70 वर्षो में आपने अब तक कितने गरीब को अमीर बनाया है किसी के पास जबाब? नही। जानते है क्यो? जातिगत आरक्षण के नाम पर एक-एक घर मे 10-10 सरकारी नौकरी पेशा वाले लोग हैं फिर भी उन्हें आरक्षण का लाभ मिल रहा है यहाँ तक कि जो नेता जातिवाद के नाम पर भोट बैंक बनाना चाह रहे हैं और देश मे विद्रोह फैला रहे है तीन चार पांच बार के जीते हुये नेता है और जातीय आरक्षण में यो भी खड़ा है। कैसे गिनती कर पायंगे आप की देश मे गरीब कितने है चुकी आरक्षण पर नेता और उनके नाती-पोते अपना अधिकार जमाये बैठे हुए हैं| गरीब का तो यहाँ कोई जगह ही नही है। तुगलकी सोच वाले नेता देश को जातिवाद के खाई से निकलने देना नही चाहते हैं जिससे देश विकास की नई सीढ़ियों को छू सके।

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