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पिने के पानी को तरसती जनता, दिल्ली सरकार ने जनता से किया छलावा

प्रदीप चौहान/ओखला| पानी जो हर इंसान की पहली जरूरत है और जिसके बिना जीवन संभव नहीं। हर सरकार की जिम्मेदारी है कि वो अपने नागरिको को सम्मान के साथ मुहैया कराए। देश की राजधानी दिल्ली जहाँ संसद भवन, लाल किला और अक्षरधाम जैसे पर्यटक स्थलों की जगमगाहट व चकाचौंध है। उच्चवर्गीय लोगों का जीवन स्तर बहूत ऊँचा है। जिसे देखकर गर्व होता है की हम दिल्ली में रहते हैं।

लेकिन ये सिक्के का सिर्फ एक पहलू है जिसे दुनिया को दिखाया जाता है। दिल्ली का एक रूप और भी है जिसे अगर प्रस्तुत किया जाए तो शायद आप भी शर्म महसूस करेंगे। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ दिल्ली के ओखला औधोगिक क्षेत्र में बसे संजय कॉलोनी व आसपास की कॉलोनियों की जिन्हें 40 साल पहले पुलिस, नौकरशाही, राजनीतिज्ञों और कंपनी मालिकों के सांठगांठ से क्षेत्र के औधोगित घरानों को फायदा देने व सस्ते मजदुर मुहैया कराने के लिए बसाया गया था।

40 वर्षों से बसे होने के बावजूद अगर बुनियादी अधिकारों की बात करें तो यहाँ वो दिल्ली बसती है जहां की औरतों को पूरे दिन या दिन का आधा समय पानी के टैंकरों के लिए सड़को पर बिताना पड़ता है। या फिर अपने आप को फ्री रखना पड़ता है। पति के रोजगार और बच्चों के स्कूल ना छूटे इसके लिए इन्हें खुद बाल्टियों, टंकियों और साइकिलों से पानी भरने का बीड़ा उठाना पड़ता है। चाहे बीमार हों या गर्भवती हो। अगर टैंकरों पर नहीं जाएं तो पीने का पानी परिवार को नहीं मिल सकता।

बच्चियों को स्कूल बैग की जगह टंकी व बाल्टियों को ढ़ोना पड़ता है। घंटो टैंकर का इंतजार करना पड़ता है। टैंकरों के समय में बदलाव और पानी की जरुरत में बदलाव की वजह से टंकियां ढ़ोने में देरी का असर ये होता है की स्कूल तक छूट जाते हैं। पानी की नियमित उपलब्धता न होना, यहाँ के बच्चों की शारीरिक कमजोरी, विद्यालयों में अटेंडेंस कम होने और पढाई में उनके पिछड़ने का मुख्या कारण है।

यहाँ के बुज़ुर्गो को कभी रिटायरमेंट नहीं मिलती। शारीरिक असमर्थता और घुटने का दर्द लेकर भी पानी के लिए टैंकरों पर दौड़ लगाना पड़ता है। यहां के मजदूरों को पानी के लिए अपने दहाड़ी और नौकरिया की बार बार कुर्बानी देनी पड़ती है। लड़कों के लिए शादी के रिश्ते नही आते क्योकि ये जगह देश की राजधानी दिल्ली की एक ऐसी जगह है जहा घूंघट में रहकर भी पानी भरना पड़ता है। और कोई भी समझदार पिता अपनी बेटी को पानी भरने या खुले में शौच नहीं भेजना चाहता है।

यहाँ अनेक पार्टियां आयीं और गयीं पर किसी पार्टी ने पानी के घर घर कनेक्शन के लिए काम नहीं किया। यहां के नेताओं ने पानी की समस्या को ज्यों का त्यों बना कर रखा है। इसकी पूर्ति का लालच देकर कॉलोनी के लोगों का वोट छला जाता है। टैंकर में कमी करके या टैंकर बंद करके, मजबूर किया जाता है की नौजवां उनके आगे पीछे घूमें। रैलियों में जाएं और चुनाव में उनका प्रचार करें।

अनधिकृत बोलकर टैंकरों से पानी पहुंचाना कुछ लोगों का धंधा है जिसकी तह में निजी गाड़ियों को लगवाना, पानी की चोरी और वोट बैंक की गन्दी राजनीती का खेल खेला जाता है। और इस पुरे गोरख धंधे में आम आदमी के टैक्स के पैसे की बर्बादी होती है। जबकि जनता घर घर कनेक्शन के बदले जल बोर्ड को पैसा देने को तैयार है।

देश के सबसे बड़े आंदोलन से आयी, दिल्ली की सबसे ज्यादा बहुमत प्राप्त पार्टी से लोगों को बहुत उम्मीदें थी कि वर्षों से सुखी कालोनियों को ये पानी देगी और स्थायी उपचार निकालेगी। लेकिन लगभग पिछले 4 वर्षो से पूर्ववर्ती पार्टियों की तरह ही मौजूदा आम आदमी पार्टी ने भी बहुत थोड़ा सुधार करके हालात को ज्यों का त्यों बनाये रखा है और वोट बटोरने के मुख्य हथियार के रूप में जीवंत रखना चाहती है। घर घर पानी का कनेक्शन न देकर ये पार्टी भी लोगों को धोखा दे रही है।

जब आम आदमी पार्टी (आप) 2015 में दिल्ली में सत्ता में आई थी, तो उसने घोषणा की थी कि हर महीने 20,000 लीटर पानी हर घर को मुफ्त में दिया जाएगा। लेकिन दिल्ली के स्लम बस्तियों में बसने वाले लोगों के लिए ये घोषणा एक धोखा है क्योकि जब कनेक्शन ही नहीं दिया जा रहा तो मुफ्त क्या? यहां के नौजवां जिनका बचपन यहीं बिता है, अब वो खुद बच्चे वाले बनने लगे है। उनका कहना है की टैंकरों पर पानी की लूट होती है, आपूर्ति कम और मांग ज्यादा होने कि वजह से आपस में लड़ाई झगडे होना आम बात है। बच्चों की पढाई छुटने, मजदूरों की नौकरियां छुटने के पीछे का मुख्य कारण टैंकरों से पानी भरना ही है।

लोगों के हक़ों की लड़ाई लड़ने वाले लोकराज संगठन की स्थानीय समिति की अगुवाई में यहाँ के बच्चों, बड़ों और नौजवानों ने घर-घर पानी के कनेक्शन की मांग के लिए एक आंदोलन चलाया हुआ है जिसमे वो घर घर जाकर लोगो को जागरूक करते हैं। गली गली नुक्कड़ सभाएं कर लोगों को एकजुट करते है। नाटकों, कविताओं और गीतों के द्वारा लोगों को संगठित करते है। नौजवानों के हुजूम का ये मानना है की टैंकरों पर पानी के लिए हाँथ फैलाना भीख मांगने जैसा है। भिखारी कटोरा लेकर मंगाते हैं और कॉलोनी के लोग टंकी लेकर मांगते है। इंसान होने के नाते उन्हें सम्मान के साथ पानी मिलना चाहिए। हर घर में पानी का कनेक्शन लगाकर पानी मिलना चाहिए।

अपने हक़ और सम्मान की लड़ाई के लिए धीरे-धोरे नौजवानों की एक फौज तैयार हो रही है जो इस मांग को गली-मोहल्लों, कॉलोनियों के रास्ते पूरी दिल्ली में लेकर जा रहे है। ये आंदोलन चुप चाप एक व्यापक रूप लेता जा रहा है जिसमे लोग भीख की तरह, मिलने वाले पानी को अपने अधिकार बतौर देने की मांग कर रहे है। इंसान बतौर सम्मान के साथ देने की मांग कर रहे है। मांग कर रहे हैं की उनके घरों में जल बोर्ड का कनेक्शन लगाकर, मीटर लगाकर पानी दिया जाए।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी दिल्ली में आम इंसान का पिने के पानी के लिए तरसना, पानी के लिए भीख मांगना, सभ्य समाज और हमारे विकासशील देश होने पर कलंक है।