
उन्होंने बताया कि अगर इस साल से वित्त वर्ष में बदलाव किया गया तो इसका मतलब है कि बजट को अक्टूबर के अंत या नवंबर की शुरुआत में पेश करना पड़ेगा, जो संभव नहीं है। इसके साथ एक सोच यह भी है कि वस्तु एवं सेवा कर के तौर पर एक बड़ा बदलाव लाया गया है। इसे सेटल होने के लिए कुछ समय दिया जाना चाहिए। वहीं, जीएसटी से पहले सरकार ने नोटबंदी की थी। इन दोनों कदम का कंपनियों के बिजनस पर असर पड़ा है। ऐसे में वित्त वर्ष में अभी बदलाव करने से उनकी परेशानी बढ़ सकती है। अगले लोकसभा चुनाव 2019 में होने हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि सरकार तब तक वित्त वर्ष में बदलाव नहीं करेगी। वित्त वर्ष को जनवरी से दिसंबर करने पर अलग-अलग राय सामने आ रही है।
पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार शंकर आचार्य की अगुवाई में जुलाई 2016 में इसके लिए एक समिति बनाई गई थी। इस समिति को यह प्रस्ताव बहुत आकर्षक नहीं लगा। दूसरी तरफ, नीति आयोग ने सुझाव दिया था कि वित्त वर्ष में बदलाव होना चाहिए क्योंकि अभी वाले वित्त वर्ष में वर्किंग सीजन का पूरा फायदा उठाना संभव नहीं है। उसके मुताबिक, दूसरे देशों में जनवरी से दिसंबर का वित्त वर्ष होता है। अगर भारत में इसे अपनाया जाता है तो इससे डेटा कलेक्शन पर पॉजिटिव असर होगा। एक संसदीय समिति ने भी वित्त वर्ष को अप्रैल से मार्च के बजाय बदलकर जनवरी से दिसंबर करने का सुझाव दिया था।
