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सुशीला रोहिला द्वारा रचित-शीर्षक-शिक्षक का बलिदान

शिक्षक का अर्थ है अपनी दी हुई शिक्षा को सार्थक करना।
अपने शिष्यों में अपनी शिक्षा का बीजारोपण करना। शिक्षार्थी आए और सेवार्थी की सद्भावना को बच्चों में जागरूक करना। सेवा की भावना का जागरण कहाँ से शुरू होगा। जब हम स्वयं सेवा की भावना धारण कर विद्या के मन्दिर में अपने कदम रखेगें तभी शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षार्थी को सेवार्थी बनाने में सफल हो सकते है।
शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए शिक्षा व्यापार बन्द करना होगा। दूर्भावना के वश होकर जो मानव दानव बन कर शिक्षा के साथ खिलवाड़ करते या शिक्षा को ग्रहण करने की बजाय उस पर अपना आधिपत्य जमा कर उसके स्वामी बन कर भावी पीढी की नींव को खोखला कर अपना स्वार्थ सिद्ध करने की होड़ में धन का संचय करने में अपने ईमान को दाँव पर लगा रहे है। जब कि शिक्षा एक व्यवसाय नहीं ना ही एक वस्तु है जिसका क्रय या विक्रय हो सके।

सेवा और आज्ञा एक संस्कार युक्त शिक्षा के अंतर्गत समाहित होती है ।आज समाज शिक्षित तो है लेकिन सेवार्थी की भावना का लोप होता जा रहा है । वर्तमान की शिक्षा भौतिकवादी है लेकिन इस शिक्षा में आध्यात्मिक बल की भी आवश्यकता है ।

सेवा की भावना का जागरण अध्यात्म को धारण करने से होता।है। जब हम अध्यात्म को धारण करते है तो अध्यात्म विद्या का अभ्यास करने से निजीस्वार्थ का त्याग हो जाता है। फिर हम लालचवश होकर कागज के चन्द टुकड़ों में नहीं बिकते और नहीं बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते है। उदाहरणके रूप मे जैसे बच्चों को नक्ल करवाना या उनका पेपर स्वयं करना या शिक्षा की बोली लगाना । ओपन के बोर्ड से बच्चों के अन्दर शिक्षा में गिरावट आती है। वे मेहनत करके परीक्षा नहीं देना चाहते।