संवाददाता/देहरादून। उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री श्री सतपाल जी महाराज ने “शारदा स्वर संगम” की तरफ से आयोजित “श्रद्धा स्मरण लोक पितृ स्मरण समारोह” “आवाज़ सुनो पहाड़ों की” कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि पधारे थे। उन्होंने इस कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि कला एवं संस्कृति को समर्पित मंच शारदा स्वर संगम परिवार के आयोजकों, उत्तराखंड की लोककला और संस्कृति के साधकों को मै अपनी तरफ से हार्दिक बधाई देता हूं।
उन्होंने ने कहा कि आज पितृपक्ष के इस पावन अवसर पर, जब हम अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं, “आवाज़ सुनो पहाड़ों की” और “शारदा स्वर संगम” जैसे कला एवं संस्कृति को समर्पित मंच ने इस अवसर पर लोकपितृ स्मरणोत्सव का आयोजन कर एक अत्यंत दिव्य और अनुकरणीय पहल की है।
श्री महाराज ने कहा कि यह केवल एक कार्यक्रम नहीं, यह एक संस्कार है। हम अक्सर अपने लोकपितरों को भूल जाते हैं। जिनकी उंगलियों पर ढोल दमाऊं थिरकता था, जिनके कंठ से जागर और पांडवाज गूँजते थे, जिन्होंने अपनी लेखनी से पहाड़ के दर्द को शब्द दिया, जिन्होंने अपने कैमरे से हमारी संस्कृति को परदे पर जीवंत किया-वे सभी हमारे सांस्कृतिक पितृ हैं।
श्री महाराज ने कहा कि आज हम उन्हीं दिवंगत कलाकारों, साहित्यकारों, फिल्मकारों और सांस्कृतिक विभूतियों को श्रद्धा-सुमन अर्पित करने यहाँ एकत्र हुए हैं। “कला का सम्मान, संस्कृति की पहचान”-इस उत्सव का यह मूलमंत्र ही देवभूमि की आत्मा है।
उत्तराखंड की संस्कृति केवल गीत-संगीत नहीं है, यह पहाड़ के संघर्ष, उसकी करुणा और उसके स्वाभिमान की गाथा है।
उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति से जोड़ते हुए कहा कि जब कोई हुड़का बजता है, तो वह सिर्फ लय नहीं, वह हमारे खेतों की आवाज़ है। जब कोई जागर गाया जाता है, तो वह सिर्फ भजन नहीं, वह हमारे देवताओं का आह्वान है। हमारी सरकार ने यह संकल्प लिया है कि हमारे लोक कलाकार को मंच मिले, सम्मान मिले और संरक्षण मिले।हम लोक कलाकारों की पेंशन और सम्मान निधि को निरंतर सुदृढ़ कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की लोक भाषाओं गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी के संरक्षण के लिए अकादमियों को सक्रिय किया जा रहा है। हमारे युवा जो पलायन कर गए, वे फिर से अपनी जड़ों से जुड़ें, इसके लिए हम “आवाज़ सुनो पहाड़ों की” जैसे मंचों को प्रोत्साहन दे रहे हैं, जो संस्कृति को रोजगार से जोड़ रहे हैं। आज जब हम अपने दिवंगत विभूतियों को याद कर रहे हैं, तो हमें यह भी संकल्प लेना होगा कि उनकी कला अधूरी न रहे। उनके द्वारा जलाया गया दिया हम सबको मिलकर आगे जलाना है।
श्री महाराज ने बताया कि मैं शारदा स्वर संगम के सभी सदस्यों को हृदय से बधाई देता हूँ कि आपने पितृपक्ष जैसे पवित्र समय में, श्राद्ध के साथ-साथ श्रद्धा का यह अद्भुत संगम रचा। आपने बताया कि पितृ केवल परिवार के नहीं होते, समाज के भी होते हैं, कला के भी होते हैं।
मैं दिवंगत सभी पुण्यात्माओं के चरणों में नमन करते हुए, ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वे जहाँ भी हों, उनकी आत्मा को शांति मिले और उनका आशीर्वाद उत्तराखंड की नई पीढ़ी पर बना रहे।

