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आयें हैं सो जायेंगे, राजा, रंक, फकीर

यह शरीर एक धर्मशाला है। मन पहरेदार है। और कल्याणकारी जीव धर्मशाला में ठहरा हुआ है। इसे चाहिए कि यथाशीघ्र किसी का मोह न कर साधना मार्ग में लग जाय। यह अच्छी तरह से जान लिया गया है कि यहां कोई किसी का नहीं है। नया कपड़ा दिनोंदिन पुराना होने, मैला होने और फटकर नष्ट होने की ओर अग्रसर होता है। उसी प्रकार मौत का हिसाब है। अतः जल्द से जल्द वासनाहीन होकर मोक्षधाम की ओर आगे बढऩा है। अहंता ममता आत्मशान्ति के लिए बाधक है। राजा हो या रंक मनुष्य को एक दिन यहां से जाना है। कोई सिंहासन पर बैठकर जाता है तो कोई जंजीर से बंधा हुआ जाता है। जो स्ववश है, स्व स्वरूप में स्थित हो गया है वह धन्य है और जो माया मोह में फंसा है वह जंजीर से बंधे हुए के समान है। मनुष्य कल्याण साधना न कर संसार के प्राणी पदार्थ में बंध जाता है। संसारी जीव माया मोह में फंसकर मानव जीवन के सुनहरे अवसर को खो देता है पर अंत में एक कण भी साथ जाने वाला नहीं है। इस तरह यह मूढ़ मानव अपने पैरों पर स्वयं कुल्हाड़ी मार लेता है। यह जीव मन भंवरा को बार-बार उपवनों के सुगंध से दूर रहने हिदायत देता है परन्तु यह मन भंवरा जीव की बात अनसुनी कर गर्त में जाता है। जन्म मरण तथा कर्मफल भोग का भय मनुष्य को भक्ति की ओर प्रेरित करता है। भय के बिना साधना में दृढ़ प्रीति नहीं हो सकती। भय ही परम गुरु है, पारस पत्थर है। सो अपने मन इंद्रियों के कुचालों से डरता है उसी का उद्धार होता है। जो असावधान है वह कष्ट पाता है। पालना जो कच्चा नहीं है, झुलाने से कोई रस नहीं मिलेगा। संसारी बुद्धि के लोग परमार्थ चर्चाकर अपना समय व्यर्थ में बिताते हैं। मोक्ष लाभ के लिए विषय विकार से एकदम दूर रहना होगा। कार्य में मनुष्य को पशु सदृश्य बना दिया है। अंतर केवस सिंग और पूंछ का है। एक दिन ऐसा आयेगा कि घर की नारी कौन कहे शरीर की भी नाड़ी खिसक जायेगी। अतः कबीर साहेब बार-बार उस पंक्ति की ओर याद दिलाते हुए कहते हैंः- आए हैं सो जायेंगे, राजा रंक फकीर। एक सिंहासन चढ़ि चले एक बंधे जंजीर।। -सुमित्रा साहू-